Saturday, November 25, 2017

रोज सुबह ।















रोज सुबह
सूरज की किरण की तरह
तुम्हारी याद
हमारे कमरे में आ फुदकती है ।
मैं अपने काम में लगी
कभी लोगों से बातें करती
इधर से उधर घुमती हुँ।
ये भी कभी मेरे आगे
कभी मेरे पीछे
घूमती रहती है ।
ज्यादा भगाने की कोशिशें करती हूं,
तो कभी किसी के पीछे छुप
जाती है ।
और चुप चाप सारी बातें सुनती है ।
शाम की चाय भी हम साथ ही पीते हैं।
वो गुमसुम सी
दोस्तों के साथ हमारी सारी हँसी सुनती है
फिर धीरे धीरे फुदकते फुदकते
सो जाती है ।
और साथ में हमारी रात भी हो जाती है ।
सुबह से ,
फिर से वही
जाड़े की सुबह
और तुम्हारी याद |

Friday, March 24, 2017

गायकवाड़ साहब की मुश्किल है!


बिज़नेस क्लास की टिकट पर हमें इकनॉमी में उड़ाते हो,
फ्रंट रो में बैठा कर कॉम्पेनसेट कराते हो।
ये बात और है कि तुमने हमें बताया था,
पर हमारे साथ ऍम. पी . होने का स्टेटस भी तो आया था।

25 चप्पल ही तो मारे हमने ,
वो 60 साल का था और चला था मैनेजर बनने,
शिक्षक होने का गुरूर है हममें,
और पहले भी तो संसद   के मेस में कमाल  दिखाया था हमने ,
ऐसे ही थोड़े चुन  के  आएं हैं ,
जनता को हमने बहुत चूने लगाए हैं ,

पर तुमने तो हमारे उड़ने पे बैन लगा दी है।
और रेलवे की लेट चलती ट्रेनों ने हमारी नींद उड़ा दी है।
हमने भी अपनी प्रध्यापिका से तुम्हारी शिकायत लगा दी है ।
बड़ी मुश्किल है ,
ये स्टेटस और अहं के चक्कर में फँसी अपनी साइकिल है।

Tuesday, February 28, 2017

जब छिपकली कमरे में आयी

बड़ी मुश्किल की बात थी
उस दिन रात को 
जब खिड़की के परदे हटाते समय ,
हाथ पे आ गिरी 
निरी सी छिपकली ।
पूरे कमरे  में मैंने आपातकाल जारी कर दिया ,
अब तो कोई काम  नहीं होगा , 
जब तक ये कमरे से बाहर न चली जाए ।


हॉस्टल में अपने दोस्तों को भी मैंने इतिल्ला कर दिया ,
जल्द से जल्द इस इस स्थिति में हमारी 
मदद के लिए आ जाएँ ।

अब ये छिपकली तो हैं ही बहुत डरावनी ,
इन्होंने भी तत्परता दिखाते हुए ,
हमारे घुड़कने वाले बक्शे के पीछे अपनी जगह बना ली ,
अब झाडू से मारो या बक्शे को ,
आराम से निश्चिन्त बैठी थीं वो ,
और यहाँ,
 हमारी जान निकली जा रही थी 
रात को सोयेंगे कैसे ।

तब तक हमारे दोस्त भी आ गए थे ,
हम एक बार चिल्लाते तो वो,
दो बार और चिल्लाते ,
आस पास के कमरे वाले बाहर आ गए 
उन्होंने सोचा,
 पता नहीं कौन सा बड़ा जानवर आ गया ।

पर छोटी मुँह बड़ी बात वाली कहावत ,
यहाँ पूरी उस निरी छिपकली के ऊपर सिद्ध थी ,
हम तीनो ने मिलके खूब कोशिश की 
सारे सामानों को कमरे से बहार कर दिया । 
पर हिम्मत तो देखिये, 
हमारी नहीं छिपकली की 
वो मैडम अब भी हमारे सूटकेस पे चढ़ के ही बैठी थी ।

वो तो धन्य हैं हमारे घरवाले,
की घुड़कने वाले सूटकेस था ,
वरना वो रात तो बैठे बैठे ही कटती ।

धीरे धीरे उसे हमने ,
छिपकली सहित  बाहर कर दिया 
और अगर टूट जाने के दर नहीं होता तो 
उसे सीढ़ियों पर  छिपकली सहित दौड़ाते उतार  भी देते ।


अंततः,मैडम हमारे कमरे से बाहर  हुई 
और 
हमारी  बेचैनी  फारिग हुई ।
  

Thursday, February 9, 2017

फूलों का मौसम

ये रंग बिरंगे
लाल,पीले
नारंगी ,गुलाबी

बसंत की सुंदरता बढ़ाते
ये फूल

कितने तन मन से बनाया होगा
भगवान ने इनको
एकांत में बैठे,
पहले पंखुड़ियां बनायी होंगी,
फिर उनकी कलियाँ सजाई होंगी
फिर पत्ते
फिर तो कुछ में कांटे भी डाले होंगे,
अपना सब कुछ डाल दिया होगा।
फिर अपनी आत्मा से सींचा होगा
इनकी सुंदरता को
फिर खुशबू डाली होगी

पर उन्हें क्या पता होगा
कि जिनके लिए ये फूल बनाये
वो उनकी कदर कहाँ करेंगे
वो तो बस उन्हें रौंदेंगे
और उसमें ही मजा लेंगे ।

पर कुछ होंगे
सबस अलग  ,
सींचेंगे इन पौधों को
जड़ें मजबूत बनाएंगे।
पानी खाद डाल कर ,
इन्हें बड़ा बनाएंगे।
और फिर प्रकृति की सुंदरता
और बढ़ाएंगे।

Friday, December 16, 2016

मोची की इच्छा।

ये चलते फिरते पैर,
सुबह से शाम तक ,
मैं इनमें चढ़े जूतों-चप्पलों को ही देखता हूँ,
देखता हूँ आशा से ,
पता नहीं कब इनको मेरी जरुरत पर जाए,
दूर दूर से आ रहे पैर,
सामने -पीछे से जा रहे पैर,
घूम घूम के सब पर नज़र रखता हूँ,



वैसे सच कहूं तो ये भी मनाता हूँ,
कि आज थोड़ी ज्यादा धूल हो,
या फिर कि चलते चलते किसी के जूते,
टूट जाएं।

ये लड़की जो अपने दोस्तों के साथ चली जा रही है
ये बच्चा जो दादाजी की उँगलियाँ थामे बढे जा रहा है।
ये जोड़ा जो साथ में गुनगुनाता जा रहा है।
मैं इन सबकी खुशियों में सरोबार तो होना चाहता हूँ।
पर अंदर ही अंदर ये भी चाहता हूँ ,
भगवन इनके जूते तो बड़े अच्छे हैं।
हो सके तो इनको थोड़ा गन्दा कर देना।
ज्यादा पैसै मिलेंगें
जो पैसे मिलेंगे ,
प्रसाद तुम्हे भी चढ़ा दूंगा।


अच्छा चलो गन्दा न सही ,
इनके फीते ही थोड़े उलझा देना।
कुछ तो पैसे मिल  ही जायेंगे।

बहुत ध्यान से देखता हूँ,
मैं इनके रंग को,
काले ,भूरे ,हलके भूरे 
सब पालिशें सजा के रखीं हैं मैंने,
हर पालिश की अलग अलग ब्रश के साथ।
जैसे ही जरुरत पड़े तुरंत निकाल के सामने कर दूंगा।

बस इसी आशा के साथ निहारता हूँ इनको,
पता नहीं जब कहाँ कैसे टूट जाएं ।
फिर अपने हाथों से बनाउंगा मैं इनको।
बङे प्यार से।


Tuesday, June 2, 2015

अरे,फिर खो गई।


                                                   

पता नहीं कहाँ रख दिया,
जहाँ तक याद है,
टेबल से उठा के,
सहेज कर रखी थी,
अब तो ,न,
वो सहेजने की जगह सलामत है,
न ही वो कमबख्त,
नीरी,छोटी सी चाभी,
पर बात वहाँ कहाँ खत्म हुई,
उस नन्ही चाभी को ढूंढने के चक्कर में,
महीनों पहले खोई,
कान की बाली मिल गई,
बाली मिलने की खुशी ने,
चाभी के दर्द को भुला दिया।
मैनें नये ताले और चाभियाँ,
मगवां ली।
अभी जिन्दगी फिर से रास्ते पर थी।
पर अफसोस,
आज नई चाभी फिर खो गई है।
और,डर है,
उसे ढूंढने के चक्कर में,
पूरानी वाली न मिल जाए।

Saturday, January 24, 2015

हँसते मुस्कुराते चेहरे

देखा है जब भी लोगों को हसते  हुए

गुदगुदी होती है दिल में

उनकी ख़ुशी को देखकर

उनके गाल की लाली से

मन करता है

थोड़ी देर  थम कर

हस लूँ उनके साथ

शामिल होऊं उनकी ख़ुशी में

वहीं रूक कर खो जाऊँ

ये हँसते मुस्कुराते चेहरे भी न

बहुत कुछ कह जाते हैं

और तुम

तुम्हारी हँसी  तो

मेरे लिए दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत चीज है

तुम ,तुम वो जो
आते जाते मुझे सड़क पे मिलते हो

तुम ,तुम वो जो

कभी पेड़ की छाओं में
अकेले खड़े किसी पल में खोये रहते हो

तुम ,तुम वो जो
कभी कभी अनायास ही
मेरे ख्यालों में घूमते रहते हो

तुम ,तुम वो जो
अपनी हसी में ही इतने खूबसूरत हो



आशा है
तुम यूँ ही मुस्कुराते  रहोगे

जिंदगी के ये उठते बैठते  भवर के बीच

और फैलाते रहोगे

खुशियाँ आस पास