Tuesday, May 29, 2018

आना न तुम।

ऐसे आना न तुम
जैसे महीनों सूरज की गर्मी में तपी धरती पर,
आती है बारिश की बूंदें
और उनको पाकर महक जाती है ,
जमीन।

ऐसे आना न तुम ,
जैसे पौधे के तीन चार दिनों के सूखे पत्तों पे ,
गिरता है पानी ,
और फिर वो हरे होकर खिल जाते हैं।

ऐसे आना न तुम जैसे,
महीनों सुने पड़े घर में आते हैं लोग,
और फिर उनकी चहल पहल से ,
वो चहचहाहट से भर जाता है।

ऐसे आना न तुम ,
जैसे अमावस के पंद्रह दिनों के बाद,
आता है चाँद,
और फिर वो पूरे आकाश को,
रौशन कर देता है।

तुम,
जल्दी ही आना ।

Thursday, March 22, 2018

आलमारी

ये रोज रात को आलमारी के दरवाजे ,
चर्र चर्र करते हैं।
कभी कभी तो
उठकर बंद कर देती हूं।

फिर भी थोड़ी देर बाद
फिर से चर्र चर्र करना
शुरू कर देते हैं ।

लगता है ,
तुम्हारे जैसे हैं
निहायत ही जिद्दी
पर प्यारे भी हैं,

कभी कपड़े निकालने जाती हूँ
तो खुद ही खुलकर
काम आसान भी कर देते हैं।

पर कुछ तो बात है  इनमें
आदत सी है मुझे इनकी
मेरे सारे बिखड़े कपड़े
खुद में संभाले बैठे हैं,
गिरने नही देते एक भी ,
और मेरे छोटी छोटी यादों के सामान
भी तो संजोये बैठे हैं ना।

बिल्कुल तुम जैसे हैं ये भी ।

Wednesday, February 14, 2018

तुम्हारा बुना स्वेटर माँ।

रोज सुबह
तुम्हारे हाथ से प्यार से बने स्वेटर पहनते ही
दिन  अच्छा  हो जाता है माँ।

कितनी मेहनत से बनाया होगा न ।
हज़ारों में एक रंग चुनके
किताबों में छपी अनंत डिज़ाइन में एक लेकर।
बुनने के काँटों में फंदा, एक उल्टा ,एक सीधा कर।
घंटो हाथ चलाते,

ऊन का गोला बना बनाकर ,
अपनी जिंदगी के सारे काम छोड़ कर,
इसमें सारा प्यार -दुलार भरकर।

तभी ,
तभी तो,
इसको पहनते ही ।
सारी ठंड हवा हो जाती है
और तुम्हारे प्यार की गर्माहट भर जाती है ।

ये लाल स्वेटर भी न ।

Saturday, November 25, 2017

रोज सुबह ।















रोज सुबह
सूरज की किरण की तरह
तुम्हारी याद
हमारे कमरे में आ फुदकती है ।
मैं अपने काम में लगी
कभी लोगों से बातें करती
इधर से उधर घुमती हुँ।
ये भी कभी मेरे आगे
कभी मेरे पीछे
घूमती रहती है ।
ज्यादा भगाने की कोशिशें करती हूं,
तो कभी किसी के पीछे छुप
जाती है ।
और चुप चाप सारी बातें सुनती है ।
शाम की चाय भी हम साथ ही पीते हैं।
वो गुमसुम सी
दोस्तों के साथ हमारी सारी हँसी सुनती है
फिर धीरे धीरे फुदकते फुदकते
सो जाती है ।
और साथ में हमारी रात भी हो जाती है ।
सुबह से ,
फिर से वही
जाड़े की सुबह
और तुम्हारी याद |

Friday, March 24, 2017

गायकवाड़ साहब की मुश्किल है!


बिज़नेस क्लास की टिकट पर हमें इकनॉमी में उड़ाते हो,
फ्रंट रो में बैठा कर कॉम्पेनसेट कराते हो।
ये बात और है कि तुमने हमें बताया था,
पर हमारे साथ ऍम. पी . होने का स्टेटस भी तो आया था।

25 चप्पल ही तो मारे हमने ,
वो 60 साल का था और चला था मैनेजर बनने,
शिक्षक होने का गुरूर है हममें,
और पहले भी तो संसद   के मेस में कमाल  दिखाया था हमने ,
ऐसे ही थोड़े चुन  के  आएं हैं ,
जनता को हमने बहुत चूने लगाए हैं ,

पर तुमने तो हमारे उड़ने पे बैन लगा दी है।
और रेलवे की लेट चलती ट्रेनों ने हमारी नींद उड़ा दी है।
हमने भी अपनी प्रध्यापिका से तुम्हारी शिकायत लगा दी है ।
बड़ी मुश्किल है ,
ये स्टेटस और अहं के चक्कर में फँसी अपनी साइकिल है।

Tuesday, February 28, 2017

जब छिपकली कमरे में आयी

बड़ी मुश्किल की बात थी
उस दिन रात को 
जब खिड़की के परदे हटाते समय ,
हाथ पे आ गिरी 
निरी सी छिपकली ।
पूरे कमरे  में मैंने आपातकाल जारी कर दिया ,
अब तो कोई काम  नहीं होगा , 
जब तक ये कमरे से बाहर न चली जाए ।


हॉस्टल में अपने दोस्तों को भी मैंने इतिल्ला कर दिया ,
जल्द से जल्द इस इस स्थिति में हमारी 
मदद के लिए आ जाएँ ।

अब ये छिपकली तो हैं ही बहुत डरावनी ,
इन्होंने भी तत्परता दिखाते हुए ,
हमारे घुड़कने वाले बक्शे के पीछे अपनी जगह बना ली ,
अब झाडू से मारो या बक्शे को ,
आराम से निश्चिन्त बैठी थीं वो ,
और यहाँ,
 हमारी जान निकली जा रही थी 
रात को सोयेंगे कैसे ।

तब तक हमारे दोस्त भी आ गए थे ,
हम एक बार चिल्लाते तो वो,
दो बार और चिल्लाते ,
आस पास के कमरे वाले बाहर आ गए 
उन्होंने सोचा,
 पता नहीं कौन सा बड़ा जानवर आ गया ।

पर छोटी मुँह बड़ी बात वाली कहावत ,
यहाँ पूरी उस निरी छिपकली के ऊपर सिद्ध थी ,
हम तीनो ने मिलके खूब कोशिश की 
सारे सामानों को कमरे से बहार कर दिया । 
पर हिम्मत तो देखिये, 
हमारी नहीं छिपकली की 
वो मैडम अब भी हमारे सूटकेस पे चढ़ के ही बैठी थी ।

वो तो धन्य हैं हमारे घरवाले,
की घुड़कने वाले सूटकेस था ,
वरना वो रात तो बैठे बैठे ही कटती ।

धीरे धीरे उसे हमने ,
छिपकली सहित  बाहर कर दिया 
और अगर टूट जाने के दर नहीं होता तो 
उसे सीढ़ियों पर  छिपकली सहित दौड़ाते उतार  भी देते ।


अंततः,मैडम हमारे कमरे से बाहर  हुई 
और 
हमारी  बेचैनी  फारिग हुई ।
  

Thursday, February 9, 2017

फूलों का मौसम

ये रंग बिरंगे
लाल,पीले
नारंगी ,गुलाबी

बसंत की सुंदरता बढ़ाते
ये फूल

कितने तन मन से बनाया होगा
भगवान ने इनको
एकांत में बैठे,
पहले पंखुड़ियां बनायी होंगी,
फिर उनकी कलियाँ सजाई होंगी
फिर पत्ते
फिर तो कुछ में कांटे भी डाले होंगे,
अपना सब कुछ डाल दिया होगा।
फिर अपनी आत्मा से सींचा होगा
इनकी सुंदरता को
फिर खुशबू डाली होगी

पर उन्हें क्या पता होगा
कि जिनके लिए ये फूल बनाये
वो उनकी कदर कहाँ करेंगे
वो तो बस उन्हें रौंदेंगे
और उसमें ही मजा लेंगे ।

पर कुछ होंगे
सबस अलग  ,
सींचेंगे इन पौधों को
जड़ें मजबूत बनाएंगे।
पानी खाद डाल कर ,
इन्हें बड़ा बनाएंगे।
और फिर प्रकृति की सुंदरता
और बढ़ाएंगे।