Thursday, February 9, 2017

फूलों का मौसम

ये रंग बिरंगे
लाल,पीले
नारंगी ,गुलाबी

बसंत की सुंदरता बढ़ाते
ये फूल

कितने तन मन से बनाया होगा
भगवान ने इनको
एकांत में बैठे,
पहले पंखुड़ियां बनायी होंगी,
फिर उनकी कलियाँ सजाई होंगी
फिर पत्ते
फिर तो कुछ में कांटे भी डाले होंगे,
अपना सब कुछ डाल दिया होगा।
फिर अपनी आत्मा से सींचा होगा
इनकी सुंदरता को
फिर खुशबू डाली होगी

पर उन्हें क्या पता होगा
कि जिनके लिए ये फूल बनाये
वो उनकी कदर कहाँ करेंगे
वो तो बस उन्हें रौंदेंगे
और उसमें ही मजा लेंगे ।

पर कुछ होंगे
सबस अलग  ,
सींचेंगे इन पौधों को
जड़ें मजबूत बनाएंगे।
पानी खाद डाल कर ,
इन्हें बड़ा बनाएंगे।
और फिर प्रकृति की सुंदरता
और बढ़ाएंगे।

Friday, December 16, 2016

मोची की इच्छा।

ये चलते फिरते पैर,
सुबह से शाम तक ,
मैं इनमें चढ़े जूतों-चप्पलों को ही देखता हूँ,
देखता हूँ आशा से ,
पता नहीं कब इनको मेरी जरुरत पर जाए,
दूर दूर से आ रहे पैर,
सामने -पीछे से जा रहे पैर,
घूम घूम के सब पर नज़र रखता हूँ,



वैसे सच कहूं तो ये भी मनाता हूँ,
कि आज थोड़ी ज्यादा धूल हो,
या फिर कि चलते चलते किसी के जूते,
टूट जाएं।

ये लड़की जो अपने दोस्तों के साथ चली जा रही है
ये बच्चा जो दादाजी की उँगलियाँ थामे बढे जा रहा है।
ये जोड़ा जो साथ में गुनगुनाता जा रहा है।
मैं इन सबकी खुशियों में सरोबार तो होना चाहता हूँ।
पर अंदर ही अंदर ये भी चाहता हूँ ,
भगवन इनके जूते तो बड़े अच्छे हैं।
हो सके तो इनको थोड़ा गन्दा कर देना।
ज्यादा पैसै मिलेंगें
जो पैसे मिलेंगे ,
प्रसाद तुम्हे भी चढ़ा दूंगा।


अच्छा चलो गन्दा न सही ,
इनके फीते ही थोड़े उलझा देना।
कुछ तो पैसे मिल  ही जायेंगे।

बहुत ध्यान से देखता हूँ,
मैं इनके रंग को,
काले ,भूरे ,हलके भूरे 
सब पालिशें सजा के रखीं हैं मैंने,
हर पालिश की अलग अलग ब्रश के साथ।
जैसे ही जरुरत पड़े तुरंत निकाल के सामने कर दूंगा।

बस इसी आशा के साथ निहारता हूँ इनको,
पता नहीं जब कहाँ कैसे टूट जाएं ।
फिर अपने हाथों से बनाउंगा मैं इनको।
बङे प्यार से।


Tuesday, June 2, 2015

अरे,फिर खो गई।


                                                   

पता नहीं कहाँ रख दिया,
जहाँ तक याद है,
टेबल से उठा के,
सहेज कर रखी थी,
अब तो ,न,
वो सहेजने की जगह सलामत है,
न ही वो कमबख्त,
नीरी,छोटी सी चाभी,
पर बात वहाँ कहाँ खत्म हुई,
उस नन्ही चाभी को ढूंढने के चक्कर में,
महीनों पहले खोई,
कान की बाली मिल गई,
बाली मिलने की खुशी ने,
चाभी के दर्द को भुला दिया।
मैनें नये ताले और चाभियाँ,
मगवां ली।
अभी जिन्दगी फिर से रास्ते पर थी।
पर अफसोस,
आज नई चाभी फिर खो गई है।
और,डर है,
उसे ढूंढने के चक्कर में,
पूरानी वाली न मिल जाए।

Saturday, January 24, 2015

हँसते मुस्कुराते चेहरे

देखा है जब भी लोगों को हसते  हुए

गुदगुदी होती है दिल में

उनकी ख़ुशी को देखकर

उनके गाल की लाली से

मन करता है

थोड़ी देर  थम कर

हस लूँ उनके साथ

शामिल होऊं उनकी ख़ुशी में

वहीं रूक कर खो जाऊँ

ये हँसते मुस्कुराते चेहरे भी न

बहुत कुछ कह जाते हैं

और तुम

तुम्हारी हँसी  तो

मेरे लिए दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत चीज है

तुम ,तुम वो जो
आते जाते मुझे सड़क पे मिलते हो

तुम ,तुम वो जो

कभी पेड़ की छाओं में
अकेले खड़े किसी पल में खोये रहते हो

तुम ,तुम वो जो
कभी कभी अनायास ही
मेरे ख्यालों में घूमते रहते हो

तुम ,तुम वो जो
अपनी हसी में ही इतने खूबसूरत हो



आशा है
तुम यूँ ही मुस्कुराते  रहोगे

जिंदगी के ये उठते बैठते  भवर के बीच

और फैलाते रहोगे

खुशियाँ आस पास


Tuesday, November 11, 2014

ये रिश्ते

आजकल रिश्ते
कपड़ो की तरह बदलते हैं हम
पता नहीं क्या चाहते हैं जिंदगी से
अपनी ही ख्वाहिशों के चक्कर में उलझते हुए
भूल ही जाते हैं
आखिर पाना क्या चाहते थे ?
ये रिश्ते भी न






Saturday, April 26, 2014

ख़ुशी !!

क्या कहूँ
कितनी ख़ुशी मिली
देख कर..

जिस गुलाब के पोधे
को
सूखने से
बचाने  की
इतनी
कोशिश
की थी ..

पत्तियां..
सूख़
गयी थी
 जिसकी ...
एक एक कर |

फिर भी
डालती रही
उसमें
पानी ..

कि
क्या पता ?

और आज सुबह
नयी
पत्तियां निकल
आयीं है
उसमें |


Wednesday, February 12, 2014

स्वीकारोक्ति

 तुम भरकस कोशिश करना
तोड़ने की मुझे
मसल देना
मेरी सारी ख्वाहिशों  को
जोर से
डालना ऐसी नज़र मुझपे
लगे मैं बस एक वस्तु होऊं

कि लगे अभी जल जाऊं
धरती फटे
मैं समा जाऊं
जैसे कि
मेरा कोई अपना अस्तित्व ही न हो
मैं निहायत ही
तुम्हारी इस सोच का हिस्सा होऊं

कि कहीं अकेले जाने में
डर से कदम खुद ब खुद ही पीछे मुड़ जाएँ

जड़ हो जाएँ


पर विश्वास करो मेरा

मैं उठूंगी
दम थाम कर
हूंकार भर के उठूंगी
कि चाहे जितना दबाओ मुझे
उतना ही मजबूत होउंगी मैं

कि जब उठूँ
तुम देखने मुझे
अपनी हारी हुई
आंखों से


मेरी आशा भरी
मजबूत
नज़रों को